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उज्जैन में सामर्थ्य देने वाले श्री अरूणेश्वर 76/84 महादेव मंदिर

उज्जैन में सामर्थ्य देने वाले श्री अरूणेश्वर 76/84 महादेव मंदिर
उज्जैन में सामर्थ्य देने वाले श्री अरूणेश्वर 76/84 महादेव मंदिर

उज्जैन: अनादि नगरी उज्जयिनी जहाँ भूतभावन महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग, उत्तरवाहिनी पवित्र शिप्रा नदी, हरसिद्धि शक्तिपीठ, अभयप्रदाता अक्षयवट, सर्वकार्य सिद्ध करने वाले गणनायक चिन्तामण गणेश तथा शत्रुसंहारक काल भैरव की उपस्थिति के कारण ही वन्दनीय और स्मरणीय नहीं है। यह नगरी 84 महादेवों की उपस्थिति से भी प्रणम्य और प्रेरक है। ये चौरासी महादेव अपने ऐतिहासिक महत्व के साथ-साथ धर्म की प्राण प्रतिष्ठा करते हुए आज भी लाखों-करोड़ों धर्मालुजनों को दर्शन-पूजन और स्मरण करने मात्र से असीम पुण्य लाभ का संयोग उपस्थित करते हैं। पुराणों में वर्णित इस उज्जयिनी के इस महाकालवन में प्रतिष्ठित इन चौरासी महादेवों के आध्यात्मिक, धार्मिक एवं ऐतिहासिक महत्व के साथ-साथ उनसे जुड़ी हुई कथाओं का वर्णन उल्लेखित है।
अद्भुत महिमा वाले

उज्जैन में सामर्थ्य देने वाले श्री अरूणेश्वर 76/84 महादेव मंदिर

महादेवों में छियोत्तरवें क्रम पर है। पुण्यप्रद शिप्राजी के किनारे रामघाट के पास स्थित श्री अरूणेश्वर के विषय में एक कथा इस प्रकार है कि-
प्रजापति ब्रह्मा ने अपनी पुत्रियों कद्रु और विनता को कश्यप मुनि से ब्याह दिया। दोनों ने कश्यप मुनि को प्रसन्न कर वर माँगे। कद्रु ने जहाँ एक हजार तेजस्वी सर्प पुत्र के रूप में माँगे तो विनता ने कद्रु के पुत्रों से भी परम तेजस्वी दो पुत्रों की इच्छा व्यक्त की। कश्यप मुनि तथास्तु कहकर तपस्या करने चले गये। वर अनुसार कद्रु को एक हजार सर्पपुत्र हुए, वहीं विनता को मात्र दो अंडे। जब वे दोनों अंडे पाँच सौ वर्षों के बाद भी पुत्र रूप में नहीं बदले तो विनता ने एक अंडे को फोड़ दिया। अपरिपक्व उस अंडज ने पुत्र रूप में अपनी माँ पर क्रोध किया और श्राप दिया। क्रोध में अपनी ही माँ को शाप देने से उस अंडज पुत्र अरूण को बहुत दु:ख हुआ तब उसने नारदजी से पश्चाताप का कारण पूछा। नारदजी ने महाकाल वन स्थित इस परम तेजस्वी यात्रेश लिंग के दर्शन और उपासना करने को कहा। विनता पुत्र अरूण ने तब इस दिव्यलिंग की उपासना की, जिससे महादेव अतिप्रसन्न हुए तथा उसके सभी संशयों को शान्त कर वर दिया कि तुम असीम सामर्थ्य से युक्त होकर भुवन भास्कर आदित्य के सारथी बनों तथा सूर्य से भी पहले तुम्हारा उदय हो। अरूण द्वारा आराधित यह दिव्यलिंग तभी से श्री अरूणेश्वर के रूप में प्रसिद्ध हुआ।

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